दीवाली न थी आज
न ही त्योहारों का मौसम था
आज एक माँ की आँखों में
औलाद के होने का ग़म था
आज मूँछों पर ताव न था
झुके हुये थे पिता के कंधे मलाल था
उनको भी ये क्यों बने हुये थे
अब तक अंधे खुल गया वो
राज़ अब जो बरसों से था
छुपा हुआ न जाने क्यों हाथ पिता का
अपने सीने पे था रुका हुआ
बिगड़ गये हालात सभी और बिखरा हुआ सा मंजर था
जब माँ पापा का लाडला लेटा कफन के अंदर था
आज सूरज को मैने वक्त से पहले ढलते देखा
आज घर के ही चिराग से मैने पूरे घर को जलते देखा