जो वर्तमान में अंकुरित होती...
मस्तिष्क के छाँव में पलती है...
अमिट अतीत की छाती पर..
जो वृक्ष रूप धर लेती है...
एक भटके भूले राही के..
जो मन में आस जगाती है..
विपदाओं के काले बादल को..
जो दूर उड़ा ले जाती है..
याद दुःखों को करने पर भी..
मुस्कान लबों पे लाती है..
तुम वो *स्मृति* हो जीवन की..
जो अस्तित्व को प्रखर बनाती है..
जग लाख कहे जो बीत चुका ..
व्यर्थ याद उसे करना है..
पर सच है मानव के मानस पर
*स्मृति* सदैव रह जाती है..
--पीयूष यादव
