हाथों की कलाई हथफूलो से सज गई

झुमको से श्रुतिपट की शोभा बढ़ गई

हार सुशोभित करता ग्रीवा को

माँग टिका बढ़ाता मस्तक की गरिमा को

सर पे पल्लू लिए नैनो में हया किए

आंगन को अपने जगमग कर गई

देखो तुम दुल्हन बन गई।


शाम की लाली हथेलियों में रची

चंद्रमा सी नथ मुख पर सजी

ये काजल ये सुर्खियां ये श्रृंगार

ये शुभ दिन और तेरे पायल की झंकार

निर्मल मन लिए संपूर्ण समर्पण किये

सबके मन को हर गई

देखो तुम दुल्हन बन गई।