यूँ उल्फत भरी निग़ाहों से शाम की लाली को न देखो
आगे स्याह रात है बेफ़िज़ूल के ख्वाब न देखो
तुमने खता की है तक़दीर पे इल्ज़ाम कैसा
अब बस सजा को देखो मुआफी की ओर न देखो
कुछ लम्हो की बात थी ताउम्र की तो नहीं
जो है नही मयस्सर उसकी ताबीर को न देखो
बस यहीं मेरे लफ़्ज़ों का सफर पूरा होता है
मुझे अब तुम शायर की नज़र से न देखो


