
यूँ उल्फत भरी निग़ाहों से शाम की लाली को न देखो
आगे स्याह रात है बेफ़िज़ूल के ख्वाब न देखो
तुमने खता की है तक़दीर पे इल्ज़ाम कैसा
अब बस सजा को देखो मुआफी की ओर न देखो
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यूँ उल्फत भरी निग़ाहों से शाम की लाली को न देखो
आगे स्याह रात है बेफ़िज़ूल के ख्वाब न देखो
तुमने खता की है तक़दीर पे इल्ज़ाम कैसा
अब बस सजा को देखो मुआफी की ओर न देखो