कल वुमन इक्विलटी डे था

औरतों की समानता का दिन

अच्छा लगा देखकर कि चलो

हमारे लिए समानता का दिन तो बना कोई

मानती हूं आज बहुत से क्षेत्रों में

औरतें पुरुष के बराबर

कंधे से कंधा मिलाकर चल रही हैं

लेकिन बहुत से क्षेत्र ऐसे भी हैं

जहां साथ चलना तो बहुत दूर

बाहर निकलने का सोच भी नहीं सकती है...


बराबरी के इस दिन मुझे याद आ गई ये रातें

बहुत भाती है ये रातें

कितनी हसीन है ना, टिमटिमाते तारे

उपर से चांद अपनी चांदनी बिखेरता

ऐसा लगता है जैसे अपनी किरणों से

सराबोर कर देगा

कभी कभी मन होता है कि

निकल जाऊं इन सुनी सड़कों पर


लेकिन.....


रात के 10:00 बजे के बाद

अगर किसी कामकाजी महिला

ने हिम्मत कर भी ली

तो उसने दूसरी रात नहीं देखी

और अगर जिंदा बच गई तो

उस रात को कभी भूल नहीं पाई...


क्यों ये रात आते ही मन में

एक डर सा बैठ जाता है

इतनी सुहानी रात भयावह क्यों बन जाती है

वो भी सिर्फ हम औरतों के लिए ही..


आखिर क्यों...??