हौले से छूकर ये हवाएं


बहुत कुछ कह जाती है


मिलकर आती जब पहाड़ों से


इठलाती सी बलखाती सी


कभी उन देवदार के पेड़ों से


जानकर आती कड़वी सच्चाई


मन करता है तो झूम जाती नदी के साथ


तो झट से जा पहुंचती है


जामुन के पेड़ के पास


आखिर हवा है


कभी पहूंच जाती उन खेतों में


जहां लहराते हैं सपने किसान के


और संग संग हो लेती है उसके


खेलती है फिर गाय की बछिया के साथ


जब थका हारा किसान सो जाता है


तो हौले हौले उसका पसीना सुखाती है


फिर पहुंच जाती उस अल्हड़ बिटिया के पास


जो मिट्टी के खिलौने बना रही


धीरे से सहला कर उसके बालों को


चल देती है उन्हीं पहाड़ों पर


ये हवाएं


@pinkrose0113