चिथड़ो से लिपटी काया
पसीने से लथपथ
चिलचिलाती धूप में
कसमसाती पेट की आग
अंतर्द्वंद उस में उलझी हुई
पीठ पर बांधे बच्चे को
खींचती गृहस्थी की गाड़ी
ढोकर अपने से दोगूना वजन
मिटाती उन अमिट रेखाओं को
जो लिखी थी किस्मत ने
धूल धूसरित होकर
धूप में अपना पक्का रंग देखती
पीकर कड़वा घूंट
डर का, द्वंद का, खौफ का
उठा तसला ईंटों से भरा
और चढ़ जाती है अटारी पर
इस उम्मीद से कि
आज की रात तो
पेट की आग बुझेगी
और आ जाती है आंखों में चमक
होठों पर फीकी सी मुस्कान
जो जान डाल देती है पैरों में
और बढ़ जाता है वेग
काम करने का
न हीं किस्मत से हारने का।
पिंकी ✍️
@pinkrose0113
