विकास आ रहा है



शाम के समय देखा था मैंने उसको

छोटी सी झोपड़ी में एक दिया

अधजला सा टिमटिमाता रहता था

वहीं से आवाज आती थी

एक छोटी बच्ची की


बाहर आंगन साफ सुथरा

जहां एक टूटी सी चारपाई पर बैठी थी उसकी मां

गुमसुम सी या कुछ गहरा सोचती हुई

पास में बर्तन मांजने का एक गड्ढा

जिसमें चावल का पानी फैला हुआ था


जीने के लिए, रहने के लिए

सुख सुविधाओं का सामान सब यहीं था

विकासशील देश की पहचान भी शायद


आज फिर उधर से गुजरी थी

न झोपड़ी थी न चारपाई

ना बच्ची की आवाज आई

ना चावल के पानी की गंध

सब शांत ,मौन , कोई शोर शराबा नहीं

विकास आ रहा था ओहो भूल गई थी ‌

रास्ता जो देना था..!


पिंकी ✍️

@pinkrose0113