बेजान सा शरीर धूल से आच्छादित

बेरहम जमाने से क्या इख्तियार करें


उठते थे हाथ जिनके देने के लिए आशीर्वाद

तानों में तब्दील है आज किस पर एतबार करें


आंखों में जो छुपा था आंसुओ में बहता है

तड़पती रही जिंदगी किसका अब दीदार करें


काजल बिंदी का हक छीन लिया रस्मों के नाम पर

कैसे जी रही है विधवा बन कैसे तुझे खबर करें


तुम तो चले गए बनकर मेरे आसमां का तारा

समाज का कोढ़ कहकर अपमानित इस कदर करें


जीतें जी पी रही विधवा बन उपेक्षिता का गरल

अभिशापित समझ खोखले रिवाजों का प्रहार करें


सिंदूर था माथे पर तब तक ही क्या मैं इंसान थी

सफेद रंग अपनाने को क्यों ये समाज मुझे मजबूर करें।



पिंकी ✍️

 @pinkrose0113