
वो खुद को छुपाकर रोती है
कौन सखी है उसकी जो धीर बंधाती है
जिस पर किया था भरोसा उसने
फल आज उसी का ही वो भुगत रही है
कहां गलती कि थी उसने सोचती है
उसके प्रेम को मना ही तो किया था
लावा था या दहकता अंगार था नहीं पता
जब गिरा चेहरे पर जैसे
ज्वालामुखी कोई फट रहा था
चीख सुनी तो सहसा आकाश भी फटा था
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