वो खुद को छुपाकर रोती है
कौन सखी है उसकी जो धीर बंधाती है
जिस पर किया था भरोसा उसने
फल आज उसी का ही वो भुगत रही है
कहां गलती कि थी उसने सोचती है
उसके प्रेम को मना ही तो किया था
लावा था या दहकता अंगार था नहीं पता
जब गिरा चेहरे पर जैसे
ज्वालामुखी कोई फट रहा था
चीख सुनी तो सहसा आकाश भी फटा था
मलय से आती शीतल समीर ने भी
लूं का रूप धरा था
तौहीनो का भुचाल सहानुभूति का दिखावा
देता कौन धीरज उसको
जिस तरह उसको छला जा
न जी पा रही थी न मर ही रही थी
जहर ये तेजाब का अंदर ही अंदर जला रही थी
किससे मांगे जवाब किससे पूछे सवाल
लड़की होने की सजा वो आज भूगत रही थी।
पिंकी ✍️
@pinkrose0113


