इन खामोश लफ्जों को स्वर मिला
जैसे ठहरी सुखी नदी को नीर मिला
तृप्त होकर कल कल गुनगुनाने लगी
पत्थरों से टकराकर राग कोई बनाने लगी
दायरो में रहकर कुछ ऐसे छलक पड़ी
मिलकर अन्य नदी से खुशी से उछल पड़ी
निकली जिधर से हरा भरा धरा को किया
खुशियां अपार दी आचमन में ले जिसने छुआ
सिमट गई कुछ दूरी पर सारी मन्नते व्यर्थ निकली
हर नदी के लिए कहां मुमकिन है जो सागर से मिली
पिंकी ✍️
@pinkrose0113


