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स्त्री का सच

फिर से तार तार हो रही जानकी की उम्मीद

हर चौराहे पर नारी अग्नि से नहा रही


फिर कदमों में गिरा हुआ अहिल्या का सत्व

अनजाने अपराध की सजा वो भुगत रही


फिर इज्जत दाव पर लगा रही द्रोपती

पत्नी होने का फर्ज कुछ ऐसे निभा रही


विरह का कष्ट भोगा उर्मिला ने

मान मर्यादा सम्मान को कुछ ऐसे बचा रही


मोक्ष प्राप्त करने की चाह में त्याग दिया यशोधरा को

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