मन के उलझनों से निकलकर
जब कभी मैं निहारती हूं प्रकृति को
तो लगता है धीरे धीरे वो
अपनी सुंदरता से मुझे सम्मोहित कर रही है
फेंक कर जाल मुझे अपनी ओर खींच रही है
शांत , निश्छल सी बिल्कुल एक स्त्री की तरह
जैसे कुछ ठहर गया हो,गहरा सा कोई समा गया हो
पाक नजर का या इस कुदरत का पहरा लगाया गया हो
इन चारों दिशाओं में फैली जैसे कोई उमंग हो
छूती जब ये शीतल हवा मन में उठती कोई तरंग हो
हंसती हूं मैं तो लगता है जैसे ये भी खिल खिल कर हंसती है
गुनगुनाती हूं तो लगता है टिमटिमाते तारों से ये मुझे देखती है।
उदास होती हूं कभी तो तन्मयता से मुझे पढ़ती है।
मैं कुछ नहीं कहती तो भी ये सब समझ जाती है।
@pinkrose0113


