डरती हूं कभी कभी खुद के वजूद से

डूबों न दे कहीं विश्व रूपी ये अपार पारावर


बाहरी आडम्बरों से मुक्त होकर

मिलना चाहती हूं खुद से कुछ पल ठहरकर


शांतचित्त तल्लीन होकर गहन नीरवता में

जानना चाहती हूं खुद को अंतर्मन अपना पढकर


बंद कर नेत्रों को नेपथ्य में सत्य को देखकर

खोना चाहती हूं खुद को स्मृतियों को बिसराकर


भरकर ह्रदय की रिक्त्ता को फूर्सत के पलों में

गढ़ना चाहतीं हूं एक रूप नया खुद को निखारकर


@pinkrose0113


पिंकी