
जो अपनी चहचहाहट से
मेरे घर आंगन को
चहकाए रखती थी
जिसकी बोली से
मेरी सुबह होती थी
शाम ढले जो छूपती थी
मेरे आंचल मे दुबककर
कभी बिन बात
ही रूठ जाती
तो कभी
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जो अपनी चहचहाहट से
मेरे घर आंगन को
चहकाए रखती थी
जिसकी बोली से
मेरी सुबह होती थी
शाम ढले जो छूपती थी
मेरे आंचल मे दुबककर
कभी बिन बात
ही रूठ जाती
तो कभी