निशब्द विभावरी विस्मित सी झांक रही

नीरव राग स्पंदित हो हवाओं में अलाप रही..


खेल रही प्रकृति लुका-छिपी का खेल कोई

ओढ़ कोहरे का दुशाला पल पल को भांप रही..


निश्चल व्योम में सितारों का जमघट सुहाना सा

कलानिधि कौमुदी संग प्रतिबिंब अपना नाप रही..


मूक हो गया कुछ पल के लिए जीवन का संगीत

निकलते आफताब की किरणों को भोर अब चाप रही..


हो गए निस्पंदित सपने पाकर मृदुल आहट उषा की

छट रहा कोहरा फैल रही सुरभि पुष्पों से पथ संवार रही..


@pinkrose0113


पिंकी ✍️