गहराइयों में दबी हुई


पीड़ा से कराहती हुई


वो नींव दर्द भरी ग़ज़ल गाती है


क्या मेरा कोई अस्तित्व नहीं


मेरे ऊपर ही टिका है इस कंगूरे का वजन


कर देता है यह मुझे बेदम


ऊपर से व्यंग्य भी करता है


कि तू निष्फल निस्वार्थ निरर्थक है


वह नहीं जानता कि जब मैं


अपनी बाजी पलटुगी


सब को गिरा कर धराशाई कर दूंगी


यह कंगुरा तो प्रतीक है परजीवी आश्रितों का


जिसका अपना कोई अस्तित्व नहीं होता


फिर भी समाज इन्ही अट्टारियों की प्रशंसा करता है और मैं


हमेशा की तरह उपेक्षित होती आई हूं


आखिर शहादते कब शोहरत के लिए दी जाती है।


@pinkrose0113