मन करता है कभी कभी


कि ये रस्मों_रिवाजों, संस्कारों


की दीवारे तोड़ कर


इस दुनिया से दूर कहीं


प्रकृति की गोद में


जाकर बैठ जाऊं


उससे बात करूं


कुछ अपनी कहूं


कुछ उसकी सुनूं


वो मुझे मेरी मां की


तरह सहलाए, मैं कुछ


न भी कहुं तो समझ जाएं


मैं उसके साथ चिड़िया की


तरह पंख खोल‌ कर उड़ जाऊं


फूलों की तरह महक जाऊं


नदियां की तरह बह जाऊं


और बर्फ की तरह पिघलकर


उसमें ही समा जाऊं


हां मन करता है...



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