गुल्लक जैसी है कविताएं मेरी


जिस में डालती हूं मै रोज


थोड़ा थोड़ा अपनापन


जिसको चुराती हूं अपनों से ही


ये कविताए उम्मीदो और


कहानियों से बहुत अलग है


ये तो वो‌ किस्से हैं जो


रोज बनते हैं रोज बिगडते है


जिनका कोई मोल नहीं होता


जिनको कोई पढ़ना नहीं चाहता


पर ये हर आम घर के किस्से हैं


जिससे होकर हम रोज गुजरते हैं


और हमेशा की तरह


अनदेखा कर आगे बढ़ जाते हैं।


पिंकी ✍️


@pinkrose0113