दरख्त गांव का
चौराहे पर खड़ा नितांत अकेला
वो दरख्त जहां कभी लगता था मेला
इस चबूतरे पर कभी सदियों के रिश्ते बनते थे
वहां आसपास के गांवो के लोग बैठा करते थे
पर आज कुदरत ने अपना रूप बदल लिया
जो पक्षी पलते थे कभी आशियां कहीं और बना लिया
आज उसकी छांव तले कोई मनुष्य नहीं आता
छांव ही देता है बस वो अब फल जो नहीं देता
उसके दामन में जो पलता था कभी निस्वार्थ से
वहीं मनुष्य आज छोड़ गया निज स्वार्थ से।
पिंकी ✍️
@pinkrose0113


