प्रेम



कैसे परिभाषित करूं

तु तो अनन्त है अनादि है

हर चर अचर प्राणी में है

प्रेम कोई कुआं नहीं

जो सुख जाएं

कोई फूल नहीं जो

मुरझा जाएं

ये तो समंदर है

जिसमें सब समां जाए

क्या हुआ गर कभी

लहरें किनारे पर न‌ पहूचे

क्या हुआ गर बादल‌ न बरसे

तो समंदर बहना थोड़ी न छोड़ देता है

जमी बंजर थोड़ी न हो जाती है

वो फिर भी प्रेममय रहते हैं

और ये सिलसिला अनवरत चलता रहेगा

क्योंकि हर प्राणी का सृजन प्रेम से हुआ है

नफरत सिर्फ विनाश‌ करती है।



पिंकी ✍️


@pinkrose0113