
परिवर्तन है नियम अगर प्रकृति का
परिवर्तन ही उद्द्येश है प्रगति का
आधुनिकता के आगमन से
हो गयी परिवर्तित प्रकृति भी
वृक्ष ,वायु ,जल और मृदा की
निरंतर घट रही है गुन्वत्ता इन की
किस तरह करु परिभाशित ओ प्रकृति तुझे मैं
जीवन दायनी कहूँ या जननी कहूँ मानवता की
तू स्वार्थ हीन है न जाने क्यों
जब
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