परिवर्तन है नियम अगर प्रकृति का
परिवर्तन ही उद्द्येश है प्रगति का
आधुनिकता के आगमन से
हो गयी परिवर्तित प्रकृति भी
वृक्ष ,वायु ,जल और मृदा की
निरंतर घट रही है गुन्वत्ता इन की
किस तरह करु परिभाशित ओ प्रकृति तुझे मैं
जीवन दायनी कहूँ या जननी कहूँ मानवता की
तू स्वार्थ हीन है न जाने क्यों
जब कर रहें शोषण हैं तेरा
शोषण कहें या अपमान कहूँ मैं
हो रहा मानव समाज से तेरा
न जाने क्य्नो सार्व्जानिक समाज को लाभन्वित करती ?
जहाँ व्यक्तिगत लाभ है मनुश्य के लिये सर्वोपरी ?
सम्भ्व्ताह प्रकृति तू अधिकार नहीं
दाय्त्यो को उचित समझती है
तभी तो बिना कुछ कहे दोहन ,शोषण और
कष्टों को सह रही है-