किस तरह करूँ परिभाषित ओ परिवर्तन तुझे? नियम कहुँ प्रक्रति का या कहुँ उद्देश्य प्रगति का? शब्द मात्र है व्यकि्तगत या समाज का आधार है तू?
व्याख्या करूँ वाक्यों में तेरी या एक शब्द ही पूर्णतः उचित है? बदलाव है ,तू सोच की अगर तो क्यों सीमाओं के संग आया है? सीमा !जो एक बंधन है शायद बंधन जो अवसर पर है तू,
क्यों न तुझे व्याख्यित करूं मैं, लेकर इस नंगे पैर वाले भिक्छूक से दशकों हैं बीतें नाम पर तेरे, पर यह आज भी भुखा है फिर से उस तीन मुँह वाले रंगीन उपकरण के, ठीक दो मीटर है दूर बैठा गाड़िया जो आधुनिकता की देन है, अब भी दूर है उस भिक्छूक से दूर है उसकी पहुँच से, दूर है उसके संपर्क से शायद बदलाव हुआ है,हाँ यह उचित है पर आज भी सि्थर है जीवन उस गरीब का सि्थर है उसकी मांग,एक रोटी और कुछ पैसों से हां यह चोर ही सही,जो परिवर्तन से कुछ चुरा रहा है चुरा रहा है सम्मान को,चुरा रहा है अधिकार को सम्मान और अधिकार वह जो आज भी दूर है बदलाव का डंका पीटे हुए,जो चंद भीऱ है खऱी क्या यह बदलाव की सीमा निर्मित नहीं करते? मैं ही अनिभिग्य था तेरे व्यापक रूप से व्यापक! या कहुँ या सीमा व्यापकता की? तू अवश्य ही शब्दों पर आश्रित है? करती फिर क्यों स्वायत्ता को प्रदर्शित है? तू सफल है, तू सफल सीमा तक है शायद यह त्रुटि है तेरी या असक्छम है इसकी बदलाव है तू स्थिति में बदलाव है तू मानसिकता में या तु एक प्रतिबिंब मात्र है हां तो फिर तेरी छवि ही है यह हां तेरी छवि है यह तू ही है बदलाव यह़...?


