स्नातक हुए हो गया है कुछ वक्त,
घरवाले चाहे नौकरी कर बने शशक्त ,
कागज लिए हम दर-दर भटकें ,
कहीं सीधे ना सुने, कहीं बस झुठी सांत्वना,
कतारों में सब, पर आगे जान पहचानवाले,
योग्यता सबसे पीछे खड़ी , जैसे जरुरत ही नहीं,
आँखों में सपने टूटते ठोकरें खाते ,
किसी पत्रकार को तो क्या,
जिसे चिंता होनी चाहिए उसे भी चिंता नहीं,
सारे बोझ ढोते-ढोते रफ़्तार होती कम ,
गला घोट कर जीते-जीते थककर मरते भी हम ,
आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा,
कहने को देश का भविष्य ,
पर वर्त्तमान बस एक अंधकूप ,
युवा की परेशानियाँ पूछे कौन ,
अफसर बनना चाहते थे ,
बस एक वोट बैंक बनकर रह गए हम |
- पिंकी झा
