लिखने बैठती हूँ मैं कुछ , 

ख्याल घूम-फिर कर तुम तक पहुँच जाते है 

कलम चल नहीं पाते आगे , 

कागज़ आँसुओ से भीग जाते है , 

कुछ जुड़ा शायद नहीं था तुमसे, 

पर इस ऊपर लिखे में था का प्रयोग कितना खलता है मुझे कोई नहीं जनता , 

यु तो कभी कुछ था नहीं कहा हुआ, 

पर इन अनकही बातों का ख़त्म होना आसान कहा , 

रोज़ मन में हज़ार चीज़े घटती तुमसे जुड़ी , 

स्तिथि अलग हम वही , 

इंतज़ार बस हकीकत का सपनो सा बनने का , 

अब सब नामुमकिन , 

स्थिर जो बदलेगा न कभी , 

चुभन अजीब सी होती , 

कटता है कुछ कतरा-कतरा , 

तकलीफ तक जिसकी दिखती नहीं , 

तुमसे उम्मीद क्या ही लगाए हम , 

चुपी की दीवार क्या ही ढाहे हम , 

रस्ते अलग हमेशा रहे , 

अब मंज़िलो पर भी अकेले रहे , 

जो मन भर आया कभी , 

जो अक्सर ही होगा, 

थोड़ा रो खुद ही चुप हो लिया करेंगे |

- पिंकी झा