चली माँ अम्बे भवानी वापिस ससुराल को ,
दस दिन बिताये ख़ुशी से हस्ते हसाते ,
है आँखे नाम बिदाई पे जन जन के ,
बरश भर रुकना पड़ेगा अब फिर मिलने ,
इकठी होंगी बातों की पोटलिया ,
अगले बरष अब बटेगी उनके आने की मिठाईया ,
माँ जा रही हो संभलकर जाना ,
बस जल्दी से लौट के आना ,
होगा आँगन सुना तुम्हारे बिना ,
नज़ाने बेटियों के ही लिए जाने का क्यों नियम बना ,
बेटे के घर रहने पे न कोई पाबंदिया ,
बेटी बिन बियाही लगे बेड़िया ,
ब्याही कुछ ज्यादा दिन रह ले तो गुनाह ,
छोडो क्या दुनिया की रस्मो पर क्या लड़े ,
जो पल बचे है तेरे संग ख़ुशी से जिए |
- पिंकी झा


