
चली माँ अम्बे भवानी वापिस ससुराल को ,
दस दिन बिताये ख़ुशी से हस्ते हसाते ,
है आँखे नाम बिदाई पे जन जन के ,
बरश भर रुकना पड़ेगा अब फिर मिलने ,
इकठी होंगी बातों की पोटलिया ,
अगले बरष अब बटेगी उनके आने की मिठाईया ,
माँ जा रही हो संभलकर जाना ,
बस जल्दी से लौट के आना ,
होगा आँगन
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