सिय तुम मत आना आज ,
आज भी है ये वही समाज ,
नाम बदला बस कलयुग है ,
अन्याय का ही ये भी युग है ,
एक रावण था त्रेता में ,
अब हर गली रावण है ,
बाहर तो बाहर अपने घर में छुपे भी रावण है ,
राम कोई नहीं है ,
पर सबका राम होने का ढोंग कायम है ,
मिथिला आज भी बेटियों के लिए पराया है ,
अयोद्धा में बहु को कोई अपना नहीं कह पाया है ,
वनवास आज भी है वैसा ही ,
तुम्हारी तरह ही नारी का अपना कोई घर न हो पाया है ,
नहीं है कोई न्याय मांगने को ,
मांग भी ले तो नहीं है कोई देनेवाला ,
तुम देवी थी लड़ी अपने सम्मान को ,
अब देवी मर चुकी नारी अन्तः की ,
सहते-सहते शोषण और अन्याय को ,
हो सके तो हिम्मत भेज दो अपनी उपहार में ,
पर मत आना देखने दृश्य असहाय ये ,
सिय तुम आज मत आना |
- पिंकी झा


