रंगो का भी आकर्षण अजब है ,
ऐसे ही होली का त्यौहार इतना सराहा थोड़ी जाता है ,
आँखे और मस्तिष्क इतनी आदि है इन रंगो की ,
कही बेढंग से रंग दिख जाये तो चीड़ जाते है ,
हर रंग ने एक विभाग भी चुन रखा है ,
जैसे लाल रंग बिन शादियाँ अधूरी ,
और बिन सफ़ेद अंतिम यात्राएं,
रंग भगवा है तो श्री राम का जयकारा ,
हरा है तो जय अल्लाह हु अकबर ,
ये सब ठीक है , अच्छा है बहुत ,
पर रंग न जाने क्यों छीन लिए जाते है कई बार,
कभी मृत्यु पर बचे साथी से लाल रंग ,
कभी उम्मीदें को तोड़कर मुस्कुराहट का गुलाबी रंग ,
कभी प्रकृति से उसकी हरियाली का हरा रंग,
कभी आज़ाद को कैद कर आसमान का नीला रंग ,
और भी ऐसे बहुत से रंग ,
क्या हमने दिए थे ये रंग ?
नहीं तो छीनने वाले हम कौन ?
शायद इस दुनिया में लीन ,
गलतफैमियो में उलझे ,
भटके एक मनुष्य मात्र |
- पिंकी झा


