आज पूर्णिमा की रात है ,
चाँद पूरा खिला है ,
तुमसे मिलना है आज ,
साथ बैठना है ,
किसी दीये की जरुरत नहीं है ,
चाँद की रौशनी ही काफी है ,
तुम्हारा चेहरा देखने को,
कुछ किस्से अपने सुनाने है ,
कुछ कहानियाँ तुम्हारी सुननी है ,
शायद गलती से हाथ भी पकड़ना है ,
इस रात की खूबसूरती को साथ महसूस करना है ,
पर तुम कौन हो? कहा हो?
यही नहीं पता मुझे ,
और ये पूर्णिमा की रात अकेले कट रही है |
- पिंकी झा
