ग्रीष्म की गर्मी बीती,
सावन की बरसात बीती,
शरद का सुहानापन बिता,
शिशिर की ठिठुरन बीती,
आया बसंत हरियाली लिए ,
ऋतुए आती-जाती रही
आये नहीं हमारे प्रिये |
सुबह आयी सूर्य देव संग ,
दोपहर को पुरी तेज़ी पर वो ,
सांय हुई डूबे सूर्य,
उगे चंद्र देव भी ,
अँधेरा बढ़ता गया,
उजाला कहि नहीं ,
चलता रहा ये सिलसिला,
हमे तो अपने प्रिय से मिलना भी न मिला |
फूल खिले बागीचे ,
भोरे मंडराते ,
तितलियाँ उड़ती बलखाती ,
अटखेलिया चलती जाती,
हमे ये देख भी बस प्रिय की याद आती |
प्रकृति बदले अपने रंग-रूप समय समय ,
हमारे मन में वो है
उनका इंतज़ार है हमे ,
जैसे मिलाती है प्रकृति सबको ,
हमे हमारे प्रिय से मिलवा दे |
- पिंकी झा


