बोलने से क्यों डरु , 

साथ चलने से मना क्यों करू , 

दूर रह क्यों आहे भरु , 

गलत क्यों बर्दाश्त करू ,

बुलन्द आवाज में क्यों बगावत न करू , 

सही के लिए कैसे न लडू ,

मन की बात अनसुनी कैसे करू ,  

आत्मा से कैसे बेमानी करू , 

प्यार में भी ईमानदार न रहु ,  

दिल की बात का भी इज़हार न करू, 

प्यार किया है, चोरी नहीं, 

जुर्म समझ छुपाये क्यों फिरू , 

अगर यु ही घुटकर जीना पड़े , 

तो जिन्दा रहकर भी क्या करू |

- पिंकी झा