मन थक गया मुझसे ,
परिवार तंग आ गया मुझसे ,
खत्म हो रहा है कुछ मुझमे ,
जिसे सँभालने की ताकत नहीं मुझमे ,
छूट रहा है रेत सा सब मुझसे ,
रुकता नहीं कोशिशों से कुछ भी मुझसे ,
कारण कई इस स्तिथि के गिने न जाये मुझसे ,
घर नाराज़ क्युकी नौकरी की न जाये मुझसे ,
मन नाराज़ क्युकी उसका भी हो न मुझसे ,
सपने अलग , सचाई अलग सहा न जाये मुझसे ,
सीधी बाटे साफ साफ कही न जाये मुझसे ,
जीवन बोझ सा जिया न जाये मुझसे ,
मरने की हिम्मत भी जुटाई न जाये मुझसे ,
न जाने क्या आगे कुछ हो पायेगा मुझसे ,
या मेरे ही अंत की शुरुआत हुई है मुझसे |
- पिंकी झा
