मृत्यु भेदभाव नहीं करती,
सब के लिए समान है,
साँसे टूटकर ख़त्म हो जाती है ,
सब अर्जित भी यही रह जाता है,
रिश्ते यही छूट जाते है ,
राख बना शरीर यही रह जाता है ,
रह जाते है रोते बिलखते अपने,
उनकी ढेर सारी यादें ,
जो घर के कोने-कोने में बसी है,
जो जिंदगी के कोने-कोने में बसी है ,
एक चलचित्र आँखों में चलता रहता है,
जिसमे वो सारे लम्हें है उनके साथ बीते,
थोड़ा सँभलने और आँसू पोछने के बाद भी,
कोई जिक्र कर दे तो यही चलचित्र चलने लगता,
खलता है उनका न होना ,
तकलीफ होती है कि,
क्यों वो बात नहीं कही,
क्यों वो बात नहीं सुनी ,
अब चाहकर भी कुछ कह सुन न पाएंगे,
पर प्रकृति का नियम अज़र अमर है,
जो आया था जायेगा ,
जो है वो भी जायेगा ,
जो आनेवाला है वो भी जायेगा ,
इस धरती पर मृत्यु ही एक अचल सत्य है |
- पिंकी झा


