विचलित मन मगन प्रिय राह देखन में ,

एक दिवस ऐसी होइहे नैन मिले उनके नैणन से ,

उहि दिन सुध सब बिसर फिरू मैं जोगन पागल सी ,

बोलन को बतिया होंगी अपार ,

अधर भुल हे आपन काज ,

मैं उनके रंग में सजना चाहू ,

तोड़ सब लोक-लाज ,

वो जो पूछे हाल मोरे ,

लागे यु कानन में कोई धुन रही बाज ,

मैं सब अपना ली हूँ उनपर अर्पण को तत्पर ,

बस मैं मिलू उनसे कल परसो नहीं आज के आज ,

अंत हो राह देखन की तपस्या ,

मिल जाये मोहे देव प्रसाद |

- पिंकी झा