तारीख २५ अप्रैल २०२१ ,
शहर का एक बड़ा अस्पताल ,
अस्पताल में मेरा १०वा दिन ,
ऑक्सीजन सत्तर से कम,
थोड़े-थोड़े हर साँस में दम तोड़ते हम ,
नर्स हैरान और परेशान ,
सोचती हुई क्या बंद हो जाएगी इसकी जिंदगी की दुकान ,
डॉक्टर आये देखने क्या हो गये हम मौन ,
मेरे परिजनों से चल रही है उनकी कॉल ,
ज़िन्दगी का साथ बस अब तब है बचा,
आँखे खोलकर ही हूँ मैं खयालो में उलझा,
पंद्रह दिन पहले बच्चे कितना खिलखिलाये थे ,
बीवी पुरानी बात पर रूठी और फिर मानी थी,
माँ खाने की थाली लेकर खिलाने आयी थी ,
पापा ने बेवजह कसके डाँट लगायी थी ,
क्या होगा इनका मेरे बिना,
घर चल पायेगा कैसे नहीं पता ,
जमा किये पैसे भी बहुत जल्दी ख़त्म हो जायेंगे ,
मर रहा बीमारी से हूँ इन्शुरन्स के पैसे कहा से आएंगे,
मकान बेच दिया तो रहने कहा जायेंगे,
मेरे बिना मेरे सब कैसे रह पाएंगे ,
कहता हूँ नर्स को जरा घरवालों से बात करा दे,
कहता हूँ उनसे घबराये बिलखे नहीं,
हिम्मत से काम ले ढांढस बँधाये,
मृत्यु ही तो जीवन का अचल सत्य है ,
जो जन्मा है मरेगा ही यही तथ्य है,
पर ये क्या ऑक्सीजन पचास से कम,
चारो और सब दौड़ते इधर उधर,
इतने में ही हम ख़त्म |
- पिंकी झा


