उनसे है हमारा कुछ अजीब सा रिश्ता ,

कुछ अलग सा है कोई किस्सा ,

लगभग रोज़ ही है मुलाक़ात, 

पर होती नहीं है जो होनी चाहिए बात , 

नज़रे मिलाना है थोड़ा मुश्किल , 

क्या है या नहीं है जानना न मुमकिन , 

कुछ है अगर तो वो बस है चुपी के सिलसिले , 

जवाब जानना है आखिर क्यों है हम मिले , 

जिद करनी है पर कैसे मैं करू , 

बात ये है सचाई से मैं डरु , 

ये मजधार है मुश्किल पर जाना है , 

सच जो है अपनाना है , 

वो भी है अड़ियल समझते कहा , 

बात रहती है शुरू हुई थी बस वहा , 

लगता है रुकना अब और बेकार होगा , 

कोशिश है मन नादान अब आगे न होगा |

- पिंकी झा