मन न जाने कहा खोया आजकल ,
न तो किसी ख्याल में गुम ,
न तो किसी सवाल में गुम ,
न है किसी और जगह ,
न है यही पर कही ,
बस चुपी का सनाटा चित्कार करता ,
कानों को ये शोर बर्दास्त से फ़ाज़िल ,
हर राह डगर खोजती फिरू ,
न मिले जिसे खोजते ,
ये खालीपन तंग किये बैठे ,
सब अस्त-व्यस्त इधर-उधर ,
चल रहा कुछ अपने अंदर ,
मालूम नहीं बस प्रभाव दिखे ,
सुबह होती सब ठीक करने के निश्चय से,
दिन ढले कश्मकश में,
रात काली पछतावे में काल लगे |
- पिंकी झा


