मैं कुछ भी नहीं इस दुनिया में , 

बस जिन्दा हूँ दिखती सबको , 

न नाम है, न पहचान है , 

बस काम कुछ में लगे , 

उसके भी न कोई सही अंजाम है , 

कही लाश तो नहीं बन गए , 

सास चलती है बस , 

बातें सुनती हूँ बस , 

उम्मीद किसीको कुछ नहीं बस , 

मैं मेरी ही नज़र में कुछ नहीं , 

मरती हूँ रोज़ , 

कई बार , 

कभी अलग तो कभी एक से कारणों से,

बेशर्म भी हूँ साँसे बचा लेती हूँ ,

फिर वही जलालत सहने को, 

क्या करू हारना परवरिश में नहीं , 

जलील हो मंजूर है , 

लड़ना छोड़ दू ये नहीं, 

टूटती रोज़ हूँ , 

समेटती टुटा जो , 

ख़त्म इतनी जल्दी हमें देख लो , 

इतनी खुश किस्मती इतनी जल्दी नहीं |

- पिंकी झा