ये कैसी महामारी है, 

चरम पर कोरोना बीमारी है, 

एक बार जो चुपके से आ जाती है, 

घर , गली, मोहल्ले, शहर सुड़ाह कर जाती है,

महामारी बनी महाभारत है, 

जीवन युद्ध रोज़ होते कुरुक्षेत्र में है, 

मृत्यु पसरी मिलती दिन के अंत में ,

खोते कभी भ्राता, पिता, पितामह परिजन प्यारे दिन के अंत में,

रुदन कान चीरते है ह्रदय चीरने के संग में ,

रक्त मैदानों में नहीं है, 

पीड़ा पर तलवार से मरने से बिल्कुल कम नहीं है, 

वो युद्ध १८ दिवस में अंत हुआ था,

इस युद्ध का आगे दीखता कोई अंत नहीं है ,

भय भयावह रूप में मन में बसेरा लिए है, 

तांडव मृत्यु का किसी घोर अपराध की और इशारा किये है, 

कितना रोये कितनी अब और लाशे जलाये ,

हिम्मत बची नहीं है हममें की और शमशान जाये,  

हे ईश्वर विनती है तुमसे अपराध की क्षमा दे दो, 

जैसी भी थी वही पुरानी दुनिया वापिस दे दो |

- पिंकी झा