लिखती हूँ जो मुझ पर है बीती,
लिखती हूँ जो औरो पर बीतते है देखी ,
थोड़ा झूठ कभी , थोड़ा सच लिखती हूँ ,
बस कुछ अफ़साने लिखती हूँ ,
जो आँसू बह न पाए आँखों से,
उन्हें स्याही से बहाया करती हूँ ,
जो चीख चीला न सके ,
उन्हें अपनी कलम से लिखती हूँ ,
जो कहना चाहिए था कह न सके ,
वो बातें कागज़ो पर लिखती हूँ ,
अपनी छोटी कोशिशें लिखती हूँ ,
यु तो इश्क़ कहना गलत नहीं,
कागज़ , कलम और मेरे रिश्ते को,
पर इश्क़ की कहानियाँ वही मसहूर है,
जिसमे आशिक़ मरते है ,
मुझे तो जीना है,
स्याही से कागज़ो को रंगते रहना है ,
इसलिए ये अलग तरह की आशिक़ी है ,
लेखक , कवि, रचनाकार आदि,
शब्द कई है मेरे काम के,
पर मुझे तो कलम सेवक कह दे कोई,
वही काफी है ,
सेवक है अब रिश्ता जोड़ लिया है ,
तो कोशिश रहेगी अंतिम स्वाश तक निभ जाये |
- पिंकी झा


