कुछ अलग सा दिन है आज ,
नहीं तो रोज इतना खलता नहीं,
तुम्हारे न होने का खालीपन ,
चलता नहीं उन बीती यादो की ओर मन,
नीर बहते नही छोड़ सारा तन ,
बेकार लगता है कोई भी धन ,
बस तुम्ही में लगा रहता है मन ,
क्या गलत था ? क्या सही हो सकता था ?
चलता है यही मंथन ,
फिर याद आता है दुनिया है बंधन
ख़तम होता है ये घमर्थन ,
वापिस वही है खेल बचा केवल जीवन-मरन |
- पिंकी झा


