खुले आसमान तले खड़े ,
खुद को खोजते बादलों में,
खामियाँ मिलती खालीपन संग ,
ख़ुशी की खिलती हसीं कभी ही,
कभी कई खाक छान कर भी खोकलापन ,
ख़ुमार मुझे अपनी खाहिशों का,
ख़ामोशी होठो पर खैरियत कुछ ना ,
खुले खत कई अपने नाम के,
पड़कर बढ़ता जाता बस खालीपन ,
आसमान चलता जाता,
हम वही खड़े बस खर्च होते |
- पिंकी झा
