कुंठित मन में क्रोध करे क्रीड़ा, 

कंठ से कुछ न निकले,

कोयल की कुक कौए की काक लगे , 

केवल काटे चुभें हर अंग में, 

कोई कैंची न मिले की क्रोध काट फेंक दे, 

कुत्तर दे कोई कचरा मन का, 

कांति लोटे जीवन में कल की, 

क्रांति आये इस कूप अंधेर में रौशनी बन , 

क्रोध के कीड़े कंकाल न हमे बना दे, 

कड़वा सह लेंगे कुछ न कुछ करके ,

जीवन हमे भी ख़ुशी का कंगन कलाई में पहनाये , 

इस क्रोध इस कुंठा की कैद से मुक्ति दिलाये |

- पिंकी झा