जब देख लेती हूँ एक झलक तुम्हारी ,
सब भूल कर वापस वही पहुँच जाती हूँ ,
जब तुमसे इश्क़ कर बैठी थी,
ये दिल न समझे जाने कुछ,
तुम्हे दे बैठी थी |
सचाईयाँ इस ज़माने के झुटला कर ,
बस तुम में खोना सही लगता है ,
बेशक सिर्फ ख्याल है ये मेरे ,
पर इनका सच होना ,
दुनिया की हर ख़ुशी से ज्यादा होगा |
जितना भी पढ़ लो,
समझा भुझा लो खुदको,
पर ये अल्हड़ नादानी नहीं रोक पाती ,
मैं जानती हूँ मैं रह लुंगी अपनी हद में,
कुछ नहीं कहूँगी मुस्कुरा दूंगी झूठी हंसी,
तुम वैसे ही कुछ नहीं कहते;
आगे भी नहीं ही कहोगे |
पर हाँ जिद करना चाहती हूँ मैं तुमसे,
एक भावी प्रेम कहानी को यु ख़त्म होते देखना ,
गवारा नहीं है मुझे,
पर दूसरा कोई रास्ता नहीं है ,
किस्मत के खेल कौन ही जाने ,
हो सकता है शायद यही सही है |
- पिंकी झा


