जुर्म क्या था उस जीव का , 

की जान लेने की जुर्रत करनी पड़ी , 

जीवन की जरूरतों में ही तो लगा था , 

दो जून की रोटी ही तो जोड़ रहा था , 

जिलत सह कर भी काम पर जमा था , 

छोटी भूल क्या हुई तुमने जालसाज़ी बता दिया, 

जबान से कुछ कहने तो देते उसे , 

जांच करके जुर्मी करार देते उसे, 

जिंदगी छिन ली जुलम ढाते-ढाते , 

मजदुर था तो क्या जीवन उसका जरुरी नहीं, 

जन्नत के तो सपने तुम छोड़ दो, 

इस जीव हत्या की सजा तुम्हे जिंदगी देगी, 

जल्लाद बनकर |

- पिंकी झा