ये नया फितूर जो चढ़ा है मुझे ,
नज़ाने किस राह ले चला है मुझे ,
डर अनजान रहो से लगता है मुझे ,
पर रुकना भी अब नहीं है मुझे |
ढोकरे कई भी लगी है मुझे ,
दर्द बहुत ज्यादा भी हुआ है मुझे ,
हार कर बैठने का मन भी करता है मुझे ,
भीतर लगी आग रुकने नहीं देती है मुझे |
सपनो के टूटने का गम पता है मुझे,
देखना छोड़ दू उन्हें नहीं आता है मुझे ,
जीना घुट घुट कर नहीं आता है मुझे ,
मर जाये कोशिशों के बीच अगर उसका गम नहीं है मुझे ,
कुछ किये बिना अपने लिए ऐसे जीना नहीं है मुझे |
- पिंकी झा
