इस मुस्कुराते चेहरे के पीछे क्या 

क्या छुपा रखा है मैंने, 

कौन देखता है , 

दुनिया के लिए लापरवाह हूँ , 

हर बात पर हंस देती हूँ , 

गंभीरता से नहीं सोचती कुछ , 

पर सच क्या है कितने लोग जानते है , 

मैं एक जलती चीता हूँ , 

जिसमे रोज बहुत कुछ जलता है ,

कभी सपने , कभी ख्वाहिशे सब , 

कही बातें , ताने घी का काम करते है , 

और शरीर मृत लगता है , 

आँखों में काजल नहीं टिकता मेरे, 

तकिये सूखे नहीं होते, 

रात काटना राक्षश से लड़ने जैसा , 

दिन का उजाला बर्दाश्त नहीं होता, 

चारो तरफ राख बची है बस , 

अपना श्राद्ध खुद जीते जी कर रही हूँ जैसे , 

फिर भी एक मुस्कान से, 

ये सब छुपा लिया करती हूँ , 

उस चीता से उठ जिन्दा दिख लिया करती हूँ , 

फिर भी मैं बेपरवाह हूँ |

- पिंकी झा