पापा की लाड़ली होती है बेटियाँ ,
माँ की सहेली होती है बेटियाँ ,
भैया की चहीती होती है बेटियाँ ,
घर की इज़्जत होती है बेटियाँ ,
खुशियों की चाभी होती है बेटियाँ ,
इन सब के बावजूद भी स्वतंत्र नहीं बेटियाँ ,
ख़ुशी बाट कर भी गम ही पाती है बेटियाँ ,
घर सजाती-बसाती पर अपना घर ढूंढ़ते रह जाती है बेटियाँ ,
नफरत की आग में जलती भी है बेटियाँ ,
सब का मन रखते-रखते अपना मन मारती है बेटियाँ ,
प्यार के बदले अपमान ही सेहती है बेटियाँ ,
रहती साथ सब के खड़े फिर भी खुद अकेले रहजाती है बेटियाँ |
- पिंकी झा


