अपने झमेलों से जूझते हम अकेले है ,
साथ लोग है कुछ करीबी कुछ अजनबी पर फिर भी हम अकेले है ,
रात के अंधेरे में चल देता है मन ,
एक सफर पर जहा जाना मुझे डराता है ,
चारो ओर काला इतना की कुछ न नज़र आता है ,
बस चलता ही जाता है , इस तरफ तो उस तरफ ,
बस खोजता है कुछ जो मिलता नहीं इसे,
कई कोशिशों के बाद थककर बैठ जाता है ,
दया बहुत आती है इस पर ,
गले लगाकर भी अकेलापन दुर नहीं हो पता ,
सोचती हूँ किसी समंदर में छोड़ आऊँ मन को,
लेहरो संग बहते बहते तकलीफ दूर हो,
या किसी चिता संग शमशान में जला दूँ ,
मुक्ति तो मिले इसे इन तकलीफों से,
मेरी बात ये मानता ही नहीं,
मैं और मेरा मन दोनों बस वही रह जाते है अकेले,
जहा से शुरू किया था वापस वही l
- पिंकी झा


