अन्तः मन में बहुत से अवशेष बचे ,
अधिकार से किये अपहरण ,
अवरोध ये उथान के,
आलिंगन किये बैठे अपराधी ,
अवसाद भर चुके आँख तक ,
लगे मेरी अंत का अंकुर,
अपेक्षा अंतिम चरण तक पहुंची,
अक्षर का आश्रय भी नहीं,
बंद होता लगे जीवन का अख़बार ,
अस्त होने को जीवन का आदित्य तैयार,
तभी हाथ थामे अदृश्य , अनजान कुछ ,
कहे अजय तू , अग्नि बची तुझमे ,
अनगिनत अवसर आगे आखेटन को,
अग्निपरीक्षा अंत को अग्रसर ,
देखेगा अब तू अघटित अपना अग्रिम अद्भुत ,
अथक परिश्रम और आस्था लिए आगे बढ़ |
- पिंकी झा


